shiv 1 ganeshavoice.in सावन में रुद्राक्ष और भगवान शिव का ख़ास संबंध: जानें धारण करने की विधि : Rudraksh
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सावन में रुद्राक्ष और भगवान शिव का ख़ास संबंध: जानें धारण करने की विधि : Rudraksh

Rudraksh : सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा करने का विशेष महत्व बताया गया है। 20 जुलाई मंगलवार के दिन देवशयनी एकादशी थी। देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु निद्रा लोक में चले जाएंगे और फिर 14 नवंबर से देवोत्थान एकादशी के दिन जागेंगे। ऐसे में इस दौरान सृष्टि का सारा कार्यभार भगवान शिव के कंधों पर होता है। Rudraksh :
तो आइये अब हम विस्तार में जानते हैं रुद्राक्ष और सनातन धर्म में इसका महत्व। साथ ही यह भी जानेंगे कि रुद्राक्ष कैसे धारण करें और इसे धारण करने से हमारे जीवन में क्या बदलाव आते हैं।

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रुद्राक्ष उत्पत्ति की पौराणिक कथा : Rudraksh
रुद्राक्ष उत्पत्ति से जुड़ी एक कथा शिव महापुराण में वर्णित है। शिव महापुराण की इस कथानुसार भगवान् शिव ने एक बार एक हजार वर्षों तक समाधि लगाई। इस समाधि से जब वो वापस बाहरी जगत के संपर्क में आए तो जग कल्याण के लिए उनके नेत्रों से अश्रु धारा बही और आँसू की यह बूंदें जब पृथ्वी पर गिरीं तो इनसे रुद्राक्ष वृक्षों की उत्पत्ति हुई और भक्तों के हित में यह वृक्ष पूरी धरती पर फैल गए। इन वृक्षों पर जो फल लगे उन्हें ही रुद्राक्ष कहा गया। रुद्राक्ष को पापनाशक, रोगनाशक और सिद्धिदायक माना गया है। शरीर के विभिन्न अंगों में अलग-अलग तरह के रुद्राक्ष धारण करने से लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

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रुद्राक्ष को लेकर धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यताएं
हिंदू मान्यताओं और हमारे पुराणों के अनुसार रुद्राक्ष की कृपा से व्यक्ति को जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जबकि विज्ञान का मानना है कि रुद्राक्ष से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक, पैरामैग्नेटिक जैसी तरंगे उत्सर्जित होती हैं जो कि मनुष्य जीवन के लिए किसी वरदान से काम नहीं हैं। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि रुद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति को धार्मिक, आध्यात्मिक और चिकित्सीय तीनों तरह के लाभ प्राप्त होते हैं।

विभिन्न प्रकार के रुद्राक्ष और उनका महत्व
रुद्राक्ष एक मुखी से चौदह मुखी तक होते हैं और हर रुद्राक्ष का अलग महत्व और अलग धारण विधि है। रुद्राक्ष धारण करने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि रुद्राक्ष असली है या नहीं, क्योंकि रुद्राक्ष कहीं से भी खंडित न हो, इस पर कीड़ा न लगा हो, तभी रुद्राक्ष से आपको लाभ प्राप्त होगा। मनवांछित फल को पाने के लिए रुद्राक्ष को धारण करना बहुत शुभ माना गया है।
रुद्राक्ष को पहनने के बाद व्यक्ति को जीवन और मरण का वास्तविक ज्ञान प्राप्त होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। आंतरिक शक्तियों को जागृत करने के लिए भी इसे धारण किया जाता है। इसके चिकित्सीय गुण तनाव, उच्च रक्तचाप और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं से छुटकारा दिलाते हैं।

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एक मुखी रुद्राक्ष
हिंदू शास्त्रों के अनुसार, उस रुद्राक्ष को एक मुखी रुद्राक्ष कहा जाता है जिसमें एक आँख हो। यह रुद्राक्ष भगवान शिव का प्रतीक स्वरूप माना जाता है। ज्योतिष में एक मुखी रुद्राक्ष का स्वामी सूर्य ग्रह है इसलिए इसे आत्म चेतना को जाग्रत करने का कारक भी माना जाता है। इस रुद्राक्ष को धारण करने से लौकिक और पारलौकिक अनुभव को प्राप्त किया जा सकता है।
इस रुद्राक्ष के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर आत्मबल का भी निर्माण होता है। इसके साथ ही इसे धारण करने से आप के अंदर नेतृत्वकारी क्षमताओं का विकास होता है। सूर्य के समान आप में तेज की वृद्धि होती है और आप हर स्थिति में अच्छा प्रदर्शन कर पाने में सक्षम होते हैं।

एक मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि –
रुद्राक्ष को पहनने से पूर्व इस पर गंगाजल या कच्चे दूध का छिड़काव करें।
इसके बाद धूप, अगरबत्ती जलाकर भगवान शिव की आराधना करें।
उन्हें सफ़ेद पुष्प अर्पित करें।
इसके बाद रुद्राक्ष मंत्र ‘ॐ ह्रीं नमः:’ का 108 बार जाप करना चाहिए।
आप सूर्य देव के बीज मंत्र ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः’ का 108 बार जाप करके भी इसे धारण कर सकते हैं।
पूजा-अर्चना करने के बाद रविवार को प्रातः काल में या कृतिका, उत्तराफाल्गुनी और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में रुद्राक्ष को धारण करना शुभ होता है।

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दो मुखी रुद्राक्ष
दांपत्य जीवन में सामंजस्य बिठाने के लिए दो मुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार यह रुद्राक्ष भगवान शिव के अर्द्ध-नारीश्वर रूप का प्रतीक है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार दो मुखी रुद्राक्ष का स्वामी ग्रह चंद्र है। जिन जातकों की कुंडली में चंद्र कमजोर है उन्हें दो मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। विशेषकर गर्भवती महिलाओं द्वारा यदि इस रुद्राक्ष की आराधना की जाए तो उन्हें इससे लाभ मिलता है। यह रुद्राक्ष बायीं आँख से जुड़े रोगों के साथ-साथ फेफड़े, हृदय और दिमाग से संबंधित बीमारियों को मिटाने में भी लाभकारी साबित होता है।
दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि-
दो मुखी रुद्राक्ष को सफ़ेद या काले धागे में पिरोकर अथवा सोने या चाँदी की चेन में पिरोकर धारण करना चाहिए।
धारण करने से पूर्व रुद्राक्ष को गंगाजल या दूध से शुद्ध करें।
शिव-पार्वती जी की धूप अगरबत्ती जलाकर पूजा करें और उन्हें सफ़ेद पुष्प अर्पित करें।
इसके बाद चंद्र के बीज मंत्र ‘ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः’ का 108 बार जाप करें।
आप रुद्राक्ष मंत्र ‘ॐ नम:’ का 108 बार जाप करके भी इसे धारण कर सकते हैं।
इसके उपरांत हस्त, रोहिणी, श्रवण नक्षत्र में या सोमवार के दिन दो मुखी रुद्राक्ष को धारण करें।

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तीन मुखी रुद्राक्ष
तीन मुखी रुद्राक्ष को भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पहनना चाहिए। वैदिक ज्योतिष के अनुसार मंगल ग्रह को तीन मुखी रुद्राक्ष का स्वामी माना गया है। तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से कुंडली से मंगल दोष दूर हो जाता है। इस रुद्राक्ष को विद्या प्राप्ति के लिए भी धारण किया जाता है। इसे धारण करने से तन और मन शुद्ध होता है।
तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि-
तीन मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करें।
इसके बाद हनुमान जी की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने धूप-अगरबत्ती जलाकर उनकी पूजा-अर्चना करें।
इसके बाद हनुमान जी को लाल पुष्प अर्पित करें और मंगल देव के बीज मंत्र ‘ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः’ का जाप करें।
आप रुद्राक्ष मंत्र ‘ॐ क्लीं नमः’ का 108 बार जाप करके भी रुद्राक्ष को धारण कर सकते हैं।
इस विधि को करने के बाद मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्र में अथवा मंगलवार को प्रातः काल में इस रुद्राक्ष को धारण करें।

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चार मुखी रुद्राक्ष
चार मुखी रुद्राक्ष का संबंध त्रिदेवों में से एक भगवान ब्रह्मा जी से माना जाता है। इस चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने वाले व्यक्ति को भगवान ब्रह्मा की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता का विकास होता है। चार मुखी रुद्राक्ष पर बुध ग्रह का आधिपत्य माना जाता है। चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से व्यक्ति को खुद में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। यह रुद्राक्ष किडनी और थायराइड से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए भी पहना जाता है।
चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि-
चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से पूर्व इसे कच्चे दूध या गंगाजल से शुद्ध कर लें।
इसके बाद भगवान् विष्णु की धूप-दीप जलाकर आराधना करें और उन्हें पीले पुष्प अर्पित करें।
इसके बाद रुद्राक्ष मंत्र ‘ॐ ह्रीं नमः:’ का 108 बार जाप करें।
आप बुध ग्रह के बीज मंत्र ‘ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः’ का कम-से-कम 108 बार जाप करके भी रुद्राक्ष को धारण कर सकते हैं।
इस क्रिया को करने के बाद बुधवार के दिन अथवा आश्लेषा, ज्येष्ठा, रेवती नक्षत्र में चार मुखी रुद्राक्ष को धारण करें।

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पाँच मुखी रुद्राक्ष
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार देव गुरु बृहस्पति को पांच मुखी रुद्राक्ष का अधिपति माना गया है। पाँच मुखी रुद्राक्ष को धारण करने से जातक को मानसिक शांति का अनुभव होता है और इससे स्वास्थ्य में भी सकारात्मक बदलाव आते हैं। इस रुद्राक्ष को धारण करने से मनुष्य की आयु में भी वृद्धि होती है। माना जाता है कि जो भी जातक पाँच मुखी रुद्राक्ष धारण करता है उसे भगवान् शिव के पाँच रूपों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस रुद्राक्ष को धारण करके व्यक्ति किसी भी तरह की दुर्घटना से बच जाता है।

पांच मुखी रुद्राक्ष को धारण करने की विधि-
पाँच मुखी रुद्राक्ष को सोने या चाँदी में मढ़वाकर या बिना मढ़वाए भी धारण कर सकते हैं।
इस रुद्राक्ष को धारण करने से पूर्व इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करना चाहिए इसके बाद धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए।
तत्पश्चात ‘ॐ ह्रीं नमः:’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
आप गुरु बृहस्पति के बीज मंत्र ‘ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः’ का 108 बार जाप करके भी रुद्राक्ष को धारण कर सकते हैं।
इस विधान को करने के बाद गुरुवार के दिन पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में पांच मुखी रुद्राक्ष को धारण करें।

संकलन
श्री ज्योतिष सेवा संस्थान भीलवाड़ा (राजस्थान)

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महेश के. शिवा www.ganeshavoice.in के मुख्य संपादक हैं। जो सनातन संस्कृति, धर्म, संस्कृति और हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतें हैं। इन्हें ज्योतिष विज्ञान और वेदों से बहुत लगाव है।
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