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Death मृत्यु के समय पुत्र के सिर का मुंडन क्यों, हिन्दू धर्म मे पुत्र आवश्यक क्यों

 

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डॉ. अरस्तू प्रभाकर

Death मृत्यु के समय पुत्र के सिर का मुंडन का बहुत बड़ा कारण दार्शनिक विचार धारा का प्रतिनिधित्व करता है। हिन्दू धर्मशास्त्र में सूर्य की नौका या नाव का उल्लेख है। इस नाव में सूर्य ,ग्रह,नक्षत्र सवार रहते हैं। ये नाव का नाविक सूर्य है जो भवसागर को पार कराता है। अर्थात आकाश गंगा में ये सभी विचरण करते हैं।

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आकाश गंगा को भवसागर माना गया है। भवसागर का दूसरा रूप वो है जब सूर्य सांय समुद्र में डूबता है, और नाव के सहारे सारे ग्रह समुद्र को पार करते हैं और पुनः पूर्व में उदय होते हैं। संक्षिप्त में सूर्य एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाता है। इस नाव की सवारी का किराया कौन देता है ?

रामायण का प्रसंग है कि वनवास के समय राम ने जब अयोध्या छोड़ा तो सरयू नदी नाव से पार की थी। किराए के रूप में सीता जी ने अपना कुछ जेवर नाविक को देना चाहा था परंतु केवट ने लेने से इनकार किया था। ये नाव वही सूर्य की नाव का रूपक है, यहाँ सरयू नदी, भवसागर का प्रतीक है,और सीता जी का केवट को कर्णफूल देना नाव का किराया है।

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बालों को सूर्य की किरणों का प्रतीक माना जाता है। जब मृतक का देह संस्कार होता है और मृतक को इस संसार से दूसरे संसार की यात्रा करनी होती है उस समय सूर्य की नाव का किराया दाह संस्कार करने वाला सूर्य किरणों के प्रतीक केशो को किराया बतौर अग्नि को समर्पित करता है। दाह संस्कार में आटा या चावल का पिंड भी अर्पित किया जाता है। इसका अर्थ है कि मृतक अपने साथ न केवल किराया चुका कर आया है अपितु पितरों(जो पूर्व में मर चुके हैं)के लिए भोजन भी ले कर आ रहा है। यूनान में प्राचीन समय मे मृतक की आंखों पर दो सिक्के रखे जाते थे जो नाविक का किराया होता था ।

हिन्दू समाज मे पुत्र कामना एक बहुत महत्वपूर्ण व्यवस्था है कारण

पुत्र का क्या अर्थ है ? पुत या पूत शब्द का अर्थ है “नरक” त्र का अर्थ है तारण करने वाला, अर्थात नरक से मुक्ति या तारण करने वाला को पुत्र कहते हैं। इसी पूत या पुत शब्द से पूतना शब्द बना अर्थात नरक धारण करने वाला। जब तक मृतक के देह संस्कार के उपरांत अन्य शुद्धि संस्कार नही होते तब तक यही माना जाता है कि मृतक यातना में है, भटक रहा है।

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शुद्धि संस्कार उपरान्त ही उसे भटकन, यातना से मुक्ति मिलती है। ये शुद्धि संस्कार पुत्र के द्वारा होते हैं। प्राचीन ग्रंथ अनुसार मृतक का शुद्धि संस्कार पुत्र के द्वारा किया जाना अनिवार्य था। अतः पिता की मृत्यु उपरान्त पिता को नरक से मुक्ति पुत्र के माध्यम से मिलती है, इसलिये हिन्दू समाज मे पुत्र की कामना एक विशेष प्रयोजन है।

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महेश कुमार शिवा www.ganeshavoice.in के मुख्य संपादक हैं। जो सनातन संस्कृति, धर्म, संस्कृति और हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतें हैं। इन्हें ज्योतिष विज्ञान और वेदों से बहुत लगाव है।
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