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धर्म दर्शन

श्री हनुमान चालीसा Hanuman Chalisa के गुप्त रहस्य पार्ट 05 Hanuman Chalisa

श्री हनुमान चालीसा (Hanuman Chalisa) :

प्रभु मुद्रिक मेलि मुख नाही। जलधि लाँघि गये अचरज नाही।।

राम जी की अंगूठी आप मुँह में ले गए और समुन्द्र फांद जिसमे कोई अद्भुत कार्य नहीं।

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हनुमानजी जब समुन्द्र फांदने जा रहे थे तब राम जी की अंगूठी को मुंह में दाल लेते है। यहाँ पर ये उनके पशु होने की ओर इशारा करता है साथ ही भोलेनाथ की याद भी दिलाता है। शिव की तरह हनुमानजी भी शक्तिशाली है लेकिन दुनिया के तरीकों से अनजान है। किसी वस्तु का मूल्य लगाना इंसानो का काम है जितना उसका अर्थ दिया उतना उसका मूल्य, पशुओं के लिए खाने का मूल्य होता है। इसी तरह जब हनुमानजी अपना सीना चीरकर दिखलाते है तब राम को दिखाते है तब पता चलता है के इनके लिए वही चीज़ मूल्यवान है जिसमे राम हो देवत्व हो। हनुमान जी से हमें ये पता चलता है के राम होने का क्या अर्थ है।

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प्रीति संजय, टैरो कार्ड रीडर

एक बार नारद जी ने हनुमान से बोला कि राम से मिलने वाले का अभिनंदन करें, लेकिन विश्वामित्र का मत करना। हनुमान ने ये बात मान ली, नारद जी ने ये राम और हनुमानजी के बीच दुरी बढ़ाने के लिए किया था, विश्वामित्र ने इसे अपना अपमान समझा और मांग की कि इस वानर का वध कर दिया जाए। राम जी ने धनुष उठाया और हनुमान पर तीर छोड़ दिया हनुमानजी चुपचाप राम नाम जपते रहे और उस राम नाम की शक्ति ने शक्ति घेरा बना दिया जिसे स्वयं राम का तीर भी नहीं भेद पाया। हनुमानजी ने दिखा दिया के राम का विचार राजा राम से बड़ा है।
हनुमानजी किसी को प्रभावित नहीं करना चाहते बस अपने में खुश है और इसी कारण शक्तिशाली है। ये चोपाई हमे दुनियावी चीज़ो से हटाकर असली ज्ञान की समझ के लिए प्रेरित करती है।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ⁠।⁠।

सभी कठिन काम इस दुनिया में। आसान बनते हैं प्रभु आपकी कृपा से।

कुछ वर्षों पूर्व, भारतीय मीडिया में एक ख़बर ज़ोर-शोर से आई कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा अपनी जेब में कई अन्य चीज़ों के साथ हनुमानजी का एक चित्र भी रखते हैं। ध्यान से देखने पर पता चला कि वह चित्र भारत के मंदिरों में स्थापित मूर्ति का नहीं है, बल्कि थाईलैंड में प्रचलित हनुमानजी का है। हनुमानजी हर किसी को परेशानी का सामना करने के लिए मनोवैज्ञानिक शक्ति देते हैं, जिसके कारण दिक़्क़त को दूर करना आसान हो जाता है। यहाँ तक कि हनुमान जी का साथ होने से निर्वासित रामजी वानरों की सेना खड़ी कर लेते हैं, समुद्र पार करने के लिए पुल बना लेते हैं, रावण और उसकी राक्षस सेना को परास्त कर देते हैं और सीता को बचा लेते हैं।
हनुमानजी की बहुत सारी ऐसी कहानियाँ भी हैं, जो सिर्फ़ दक्षिण पूर्व एशियाई कथाओं में ही हैं। एक कथा में, वे मत्स्य रानी स्वर्णमच्छ, जो लंका पुल निर्माण को रोकना चाहती है, से युद्ध करते हैं। एक अन्य कहानी में, विभीषण की पुत्री बेनिया कई या बेंजकाया अपनी जादुई शक्ति से समुद्र तट पर बह आई मृत सीता बन जाती है। हनुमान शरारत को समझ जाते हैं और मृत शरीर का अंतिम संस्कार करना तय करते हैं। आग की लपट बढ़ने पर मृत शरीर अचानक ज़िंदा हो जाता है और वहाँ से भाग जाता है। जब रावण लंका पुल को तोड़ना चाहता है, हनुमान अपने आकार को बड़ा कर लेते हैं और अपनी पूँछ को इतना लंबा कि राम और वानर सेना आराम से लंका आ सके।

ये चोपाई हनुमानजी के दूसरे देश में भी आपने निस्वार्थ भक्तों की कठिनतम कार्य को भी आसान करना और उनकी हर समस्या में मदद करना।

राम दुआरे तुम रखवारे ⁠। होत न आज्ञा बिनु पैसारे ⁠।⁠।

राम के दरवाज़े को आप रक्षक रूप में मिले हैं। बग़ैर आपकी आज्ञा इसे कोई पार नहीं कर सकता।

हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं के द्वारपाल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। दरवाज़ा बाहर और अंदर, जंगली और घरेलू, प्रकृति और संस्कृति, दो दूरियों के बीच की दहलीज़ है। सुरक्षा गार्ड और सचिवों की तरह, द्वारपाल आंतरिक दुनिया की अखंडता को क़ायम रखते हैं। वे यह तय करते हैं कि मंदिर में देवता तक कौन पहुँचता है और कौन नहीं। उदाहरण के तौर पर, ओड़िशा स्थित पुरी के जगन्नाथ मंदिर में हनुमानजी बाहर खड़े हैं। लोगों का कहना है कि हनुमानजी समुद्र की आवाज़ तक को मंदिर में प्रवेश से रोकते हैं कि अंदर देवता परेशान न होने पाएँ।
एक बार रावण शिव से मिलने गया, लेकिन नंदी ने उसे दरवाज़े पर रोक दिया, क्योंकि शिव शक्ति के साथ थे और उन लोगों को अपना एकांत चाहिए था। रावण को इस तरह रोका जाना अच्छा नहीं लगा। वह बिना नंदी पर ध्यान दिए आगे बढ़ गया। जब नंदी ने रावण का रास्ता रोका, रावण ने नंदी को वानर कहा। नंदी को रावण का यह व्यवहार पसंद नहीं आया, क्योंकि वह तो अपना काम कर रहे थे। उन्होंने अभिमानी रावण को शाप दिया कि तुम्हारे विनाश का कारण वानर ही होंगे।
ऐसा माना जाता है कि इसे पूरा किया जाने के लिए शिव के देवत्व का एक हिस्सा पृथ्वी पर हनुमान के रूप में अवतरित हुआ। शिव के द्वारपाल नंदी का बदला राम के द्वारपाल हनुमान ने रावण की द्वारपाल लंकिनी को हरा कर लिया।
अयोध्या में राम के महल के दरवाज़े का रक्षक हनुमान के होने के कारण, जब राम का अपने नश्वर शरीर को छोड़ बैकुण्ठ लौटने का समय हुआ, तब मृत्यु के देवता यम शहर के अंदर आने से डर रहे थे। अंततः, राम को दरवाज़े से हनुमान को हटाना पड़ा, ताकि यम अपना कर्तव्य निभा सकें।

सब सुख लहै तुम्हारी सरना⁠। तुम रच्छक काहू को डरना ⁠।⁠।

सभी सुख आपकी शरण में उपस्थित हैं। आपके रक्षक होने पर यहाँ कोई डर नहीं है।

ये पंक्तियाँ हनुमानजी से इनसान की प्राथमिक ज़रूरत, आश्रय और संरक्षण माँग रही हैं। भारत के हर गाँव का एक रक्षक भगवान (वीर) होता था, जो गाँव को जंगली जानवरों और हमलावरों जैसे ख़तरे से बचाता था। यह देव या देवी आवासीय क्षेत्र की रक्षा करता या करती थी (क्षेत्रपाल)। हनुमान क्षेत्रपाल प्रथा से आते हैं। वे सुग्रीव को संरक्षण देते हैं और राम को संरक्षण देते हैं और अयोध्या को भी संरक्षण देते हैं।
अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग देवता को भी, जिनके अलग-अलग रूपों को परमात्मा के अनंत अवतारों में से एक माना जाता है। इसका अर्थ परमात्मा की इच्छा को समर्पित होना है, जिसका मतलब भक्तिकाल के पहले, जो भी है कर्म के अनुसार है को समर्पित होना था। यदि जैसा हम चाहते हैं वैसा हो, तो भगवान की कृपा (हरि कृपा)। यदि जैसा हम चाहते हैं वैसा न हो, तो भगवान की इच्छा (हरि इच्छा)। हरि, भगवान विष्णु का ही एक और नाम है। यह वानर का भी एक पर्यायवाची है और वानर परेशान इंसानी दिमाग़ को दर्शाता है।
ज़रूरी नहीं है कि ईश्वर हमेशा सत्ता की स्थिति में हो : वह एक नटखट बच्चा भी हो सकता है, एक भोला साधु, चपल वानर, जिससे भक्त अलग अलग भूमिका उठाने वाला बनता है: अभिभावक की या एक दोस्त की।
अगर इन पंक्तियों को ध्यान से देखा जाए, तो हमें समझ आता है कि देवता, भक्त के लिए काम करता है। भक्त समर्पित हो जाता है और तब भक्त की ख़ुशी और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी देवता की होती है। इसलिए इस छंद में सुरक्षा एक तरह से ईश्वर का डरे और भटके भक्त को सुकून देने वाला आत्मिक आलिंगन है। दिव्य शक्ति का यह भावनात्मक पहलू उसके क़द को ग्राम-रक्षक और उपज देवता से ऊँचा बना देता है।

आपन तेज सम्हारो आपै⁠। तीनों लोक हाँक तें काँपै ⁠।⁠।

आपकी महिमा सिर्फ आप सँभाल सकते हैं। तीनों संसार आपके गर्जन पर काँपते हैं।

यह छंद हनुमानजी में अवतरित तेजस्व और उनके गर्जन की महिमा कह रहा हैं। न तो कोई उनके तेज को सँभाल सकता है और न ही कोई उनके गर्जन के सामने टिक सकता है। हनुमानजी अन्य शक्तिवान लोगों से अलग हैं, क्योंकि ऐसी महान शक्ति होने के बावजूद हनुमानजी की तीनों लोकों पर राज की कोई इच्छा नहीं है। उनकी शक्ति, रामजी के विचार में ख़ुद को डुबा देने से संतुलित रहती है। तंत्र का मूल विचार दिव्य से शक्ति (सिद्धि) पाना है, जबकि वेदांत का मूल विचार दिव्य परमात्मा में ख़ुद को समाहित (समाधि) किया जाना है।
हनुमानजी पाताल में जाते हैं, लेकिन वहाँ उनका सामना नागों से नहीं, बल्कि कालीजी की पूजा करने वाले असुरों, राक्षसों और पिशाचों से होता है, जो मानव बलि देते हैं और टोना-टोटका करते हैं। पाताल के दरवाज़े पर हनुमानजी को एक द्वारपाल मिलता है, जो आधा वानर है और आधा मछली। वह उन्हें अंदर जाने से मना कर देता। हनुमानजी को एहसास होता है कि उन्हें उनकी तरह का कोई मिला है। ‘तुम कौन हो?’ वो पूछते हैं। द्वारपाल ख़ुद को हनुमानजी का पुत्र बताता है। ऐसा कैसे हो सकता है, हनुमानजी सोच में पड़ जाते हैं, क्योंकि वे तो ब्रह्मचारी संन्यासी हैं। तब वो योद्धा बताता है कि उसका जन्म उस मछली से हुआ, जिसने लंका के लिए उड़ते हनुमानजी की समुद्र में गिरने वाली पसीने की बूँद को गटक लिया था। जब हनुमानजी उसे बताते हैं कि वे कौन हैं, तो उनका बेटा उन्हें झुक कर प्रणाम करता है और उस भूमिगत क्षेत्र के रहस्य को बता कर आगे जाने देता है। हनुमानजी पाताल में प्रवेश करते हैं, भूतों और पिशाचों को परास्त करते हैं और महिरावण को चकमा दे अंततः उसका सिर धड़ से अलग कर देते हैं।

भूत और पिशाच निकट नहीं आवे। हनुमान जब नाम सुनावै।।

डरने या बेचैन होने पर पढ़ी जाने वाली ये पंक्तियाँ निःसंदेह हनुमान चालीसा की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं। ऐसा मना जाता है कि ये भूतों और आत्माओं को भगा देती हैं, या कम से कम जिसे हम भूत या आत्मा समझते हैं उसका सामना करने की शक्ति देती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान और चिकित्सा के पहले, दुनियाभर में दिमाग़ी परेशानियों का कारण भूतों और आत्माओं को माना जाता था। इसलिए यह छंद अपसामान्य घटना से भी उतना ही जुड़ा है, जितना मनोवैज्ञानिक चिकित्सा से। भूतों में विश्वास रखने वालों का मानना है कि इसे सुनकर भूत भाग जाते हैं। भूतों को आंतरिक भय की बाहरी अभिव्यक्ति मानने वालों का कहना है यह छंद दिमाग़ को आंतरिक भय दूर करने की शक्ति देता है। यह अकारण नहीं है कि ‘भूत’ का अर्थ ‘बीता हुआ समय’ भी होता है। विभिन्न संस्कृतियों में भूत विभिन्न प्रकार के माने जाते हैं। ग्रीक मिथकों में, ज़िंदा इंसान जिसने मौत को मात दी हो, उसके पहलू को भूत मानते हैं। भूतों को जीवित दुनिया से स्टिक्स नदी के पार मृतकों की दुनिया में जाना पड़ता है। जिनसे यह यात्रा नहीं हो पाती, वे ज़िंदा लोगों का जीना अपनी अपूर्ण इच्छाओं के लिए शोक, चीख़-पुकार, रोने-धोने से दूभर किए देते हैं। ईसाई पौराणिक कथाओं में, भूत की जगह आत्मा (सोल) शब्द का प्रयोग किया गया है। मृत्यु के बाद रूह पर्गेटरी में अंतिम निर्णय का इंतज़ार करती है।
हिंदू श्मशान घाट में जीवितों की प्रेतों और पिशाचों से रक्षा के लिए शिवजी और हनुमानजी की प्रतिमा लगाई जाती है। लोककथाओं में, हनुमानजी के पिता केसरी या वायु की एक बिल्ली पत्नी थी, जिसने भूतों के देव प्रेत-राजा, जिसे कुछ लोग यम भी कहते हैं, को जन्म दिया था। प्रेत-राजा का सौतेला भाई होने के कारण हनुमानजी का आह्वान उन नकारात्मक और अशुभ ताक़तों से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है, जो भूत और पिशाच से पीड़ित मनुष्यों को कष्ट देती हैं। राजस्थान के बालाजी हनुमान का मेहँदीपुर मंदिर एक ऐसा मंदिर है, जिसे तंत्र की इस विधा के लिए जाना जाता है। ऐसी लोककथाएँ भी हैं, जिनमें जादू-टोना करने वाला व्यक्ति भटक रहे प्रेतों या पिशाचों को पकड़ सकता है और उनसे अपने मन मुताबिक़ काम करा सकता है। इसलिए प्रेत और पिशाच भी, जिन्होंने हनुमानजी की शक्ति का सामना पाताल में किया था, ऐसे जादू-टोना करने वालों से अपनी रक्षा के लिए पाताली हनुमानजी की पूजा करते हैं। तांत्रिक कथाओं में, श्मशान घाट में प्रेतों पर सवार चामुंडा को पिशाचों के दल के साथ दिखाया जाता है। भुवनेश्वर, ओड़िशा के वैताल देउल में उनके इस रूप की पूजा की जाती है। यहाँ भयावह दृश्य लोगों को पागल बना देगा, अगर वे शिवजी और हनुमानजी से रक्षा नहीं माँगते।
यह छंद कह रहा है कि हनुमानजी के नाम का जाप बाहरी अशुभ ताक़तों से बचाता है।

संकट तें हनुमान छुड़ावै⁠। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ⁠।⁠।

समस्याएँ हनुमानजी दूर करते हैं। जब दिल, काम और बोल उनपर एकाग्र होते हैं।

इस छंद में हमें यह पता चलता है कि हमें हनुमानजी की कृपा कैसे मिल सकती है। वे हमारी समस्या को दूर कर देंगे, बशर्ते हम मस्तिष्क, क्रिया और वाणी को एक सुर में लाएँ और हनुमानजी पर केंद्रित हो ध्यान लगाएँ। यहाँ असली शब्द ध्यान है। इसका अर्थ एकाग्रता है और जो योग क्रिया का एक हिस्सा है और एक प्रकार का मानसिक व्यायाम है। बौद्धधर्म के पूर्वी देशों में प्रसार के साथ चीन में यह शब्द चान और जापान में जेन हो गया। एकाग्रता वैदिक अनुष्ठानों का हिस्सा हो सकती है, लेकिन वो 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध थे जिन्होंने इसे मस्तिष्क को जगाने वाली एक तकनीक में परिवर्तित किया, ताकि हम यह संसार के सच देख-समझ पाएँ। दुनिया अस्थायी है और हमारे दुख का कारण हमारी इससे जुड़ी इच्छाएँ।
500 साल पहले भक्ति काल के समय समस्या को हल किए जाने के लिए हनुमानजी का ध्यान लगाना एक तकनीक बन गया था- समस्या (संकट) कोई भी हो सकती थी -मनोवैज्ञानिक (तनाव, भय, भूत), शारीरिक (बीमारियाँ, दर्द) या सामाजिक (ख़तरा, दुर्भाग्य)। संकट मोचन यानी समस्या का निवारण करने वाला, हनुमानजी लोकप्रिय रूप है; वाराणसी में वे इसी नाम से प्रतिष्ठित हैं। जहाँ मठ के नियम बस यह सब कहते हैं कि इंद्रियों पर नियंत्रण किया जाए और मस्तिष्क के भीतर जाया जाए, हिंदू धर्म यह मानकर काम करता है कि हर इंसान महज़ आंतरिक ध्यान से जीवन नहीं जी सकता, उसे बाहर समर्थन भी चाहिए होता है। विविधता के लिए इस तरह की सोच और समरूपता से बचना ही हिंदू धर्म की पहचान हो ।

ये चोपाई हमें हनुमानजी की सहायता चाहिए कि जो मानसिक शक्ति हममें नहीं है, वह हमें मिले और जो मानसिक मुसीबते हमें कष्ट देती हैं, वे दूर हो ।

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।

रामजी जिनका सब पर शासन हैं, सन्यासी राजा हैं। वे सारे कठिन काम आप आसानी से पुरा करते हैं।।
चालीसा धीरे-धीरे अपना रास्ता बाहरी से आंतरिक, भौतिक सफलताओं की बातचीत से मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य, योग के विषय में और जीवित प्राणी और दिव्य के संबंधों तक बनाती हैं। इस छंद में हम सबको सन्यासी राजा रामजी, जिनके हर कार्य हनुमानजी द्वारा किए जाते हैं, की प्रजा बताया गया है।
यह छंद एक स्तर पर रामजी और हनुमानजी के संबंधों को स्थापित करता हैं। रामजी कर्ता हैं, एक जिम्मेदार नेता और हनुमानजी कार्यकर्ता हैं, आज्ञाकारी और प्रभावी अनुयायी और एक दूसरे स्तर पर हमें ऐसा महसूस कराया जाता हैं कि वे हनुमानजी है जिनके कारण रामजी का राज्य स्थापित होता हैं। राजा की इच्छा उसके अधिकारी और सैनिक ही पूरी करते हैं। यही कारण है कि शिवजी के भक्त नंदीजी का आह्वान करते हैं, विष्णुजी के भक्त गरुड़जी का और रामजी के भक्त हनुमानजी का आह्वान करते हैं। हनुमानजी का रामजी के प्रति प्रेम उस रूमानी प्रेम से, जो सीताजी का रामजी के प्रति हैं या रामजी का सीताजी के प्रति हैं अलग है। प्यार का अर्थ ही उनके साथ वफ़ादारी से रहना बताया जाता हैं, जिससे आप प्रेम करते हैं, चाहे जैसी भी स्थिति हो और उनके कामों को बिना कुछ वापस मिलने की इच्छा के करते जाना ही प्यार है। अहंकार में डूबा होने के कारण रावण उन कष्टों को नहीं देखता,जिसका कारक वह स्वयं हैं।उसे सिर्फ़ वह कष्ट दिखाई देता है, जो दूसरो ने उसकी आज्ञा को नहीं मनाकर या उसकी वफ़ादार नहीं होकर पहुँचाया है।
रावण आपने प्यार करनें वालों को नष्ट कर देता है और रामजी आपने प्यार करने वालो को पोषित करते हैं।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।

कोई इच्छा जो साथ लाता असंख्य पूर्णता वह पाता।
इस छंद में इच्छाओं को मनोरथ, अर्थात् मन का रथ कहा गया हैं, जो हमारे कार्यो को प्रेरित कर हमारे जीवन को प्रेरित करता है। बुद्ध कहतें हैं कि इच्छाएं ही पीड़ा है और मठों की स्थापना करते हैं, जबकि हिंदू धर्म में धर्मं: आपने सामाजिक दायित्व को निभाना,की वकालत की जाती हैं। बौद्ध धर्म सामाजिक सरंचना को बिगाड़ते हैं, हिंदू धर्म सामाजिक सरंचना को बनाए रखता हैं।
हर इन्सान को दूसरों के पर्याजीवन के अन्दर मौजूद देखा जाता हैं। इच्छा और क्रिया मनुष्य के पारस्परिकि संबंध को चलाती हैं। एक के कारण दिमाग़ में ये सारे बदलाव आए: चाहत, जुड़ाव, लालच, गर्व, ईष्या, हताशा, क्रोध, हर समस्या की परेशानी । देवी की माँग थी कि आप क्रियाओं पर ध्यान दे और इच्छाओं से दूर हो। दुसरे शब्दों में, बीज बोइए, फल की इच्छा मत कीजिए। समाजिक परिवेश में इसका अर्थ हुआ, दूसरों की भूख मिटाने के लिए काम किया जाए और दूसरों के भय को दूर किया जाए, अपनी खुद की भूख और डर में लित्प होने के बजाय,इससे ऊपर उठने की पूरी कोशिश की जाए।
इच्छाओं का रथ वह अकेली शक्ति नहीं है,जो दुनिया को नियंत्रित करती हैं।क्रिया और प्रतिक्रिया का चक्र, कर्म भी है।जो हमें मिला उस का आनंद उठाने की और जो हमें नहीं मिला उनके लिए परेशान नहीं होने की शक्ति वह चिरकालिक फल है, जिसका इस छंद में वादा किया गया है।

चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियार।।

चारों काल में फैली आपकी महिमा। आपकी प्रसिद्धि दुनिया के आर-पार प्रसारित हैं।।

जैसा पहले बताया गया, हिन्दुओं का मानना है कि दुनिया जन्म और मृत्यु के चक्रों से गुजरती है- वैसे ही जैसे हर जीवित प्राणी जीवन और मृत्यु के चक्र में गुजरता है। यहाँ ‘दुनिया’ का अर्थ प्रकृति से कम, मानव सँस्कृति से अधिक है,यानी एक संगठन एक प्रणाली।
दुनिया की उम्र को कल्प कहते हैं। इसके चार भाग होते हैं ( युग, जिसे यहाँ जुग कहा गया है): बचपन, युवा, वयस्क और वृद्धावस्था, जिन्हे क्रमशः कृत त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं। रामजी त्रेता में रहते हैं इसलिए उन्हें त्रेता का ठाकुर कहते हैं। कृष्णाजी द्वापर में रहते हैं इसलिए उन्हें द्वापर के ठाकुर कहते हैं। हनुमानजी चारों युग में रहते हैं इसलिए उन्हें चिरंजीवी (अमर) भी कहते हैं।
त्रेता युग के अंत में रामजी की मृत्यु हो जाती हैं और तब भी उसके बाद भी हनुमानजी जिंदा रहते हैं, हनुमानजी की पूजा पर अधिक जोर दिया गया है। ऐसा मानना है कि हनुमानजी अब भी धरती पर है। आज भी कहा जाता है कि हनुमानजी हिमालय में एक केले के वन में रहते हैं। जहाँ भी रामायणजी का पाठ होता है वहाँ एक कुर्सी हनुमानजी के लिए खासकर खाली रखी जाती हैं, जिससे कि जब भी वे आएँ तो उनके पास बैठने की जगह हो और वो आपने प्रिय प्रभु रामजी की कथा आनंद ले सके। विश्वास करने वालों के लिए यह सच है और अविश्वास करने वालों के लिए यह विश्वास की शक्ति। क्योंकि वे अमर है इसलिए हनुमानजी रामायण और महाभारत, दोनो में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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महेश कुमार शिवा www.ganeshavoice.in के मुख्य संपादक हैं। जो सनातन संस्कृति, धर्म, संस्कृति और हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतें हैं। इन्हें ज्योतिष विज्ञान और वेदों से बहुत लगाव है।
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