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कैसे बनता है कुंडली में धनवान Dhanvan बनने का योग, जानिए अभी

Naresh Kumar Shiva
पं. नरेश कुमार शिवा

Dhanvan : प्रत्येक मानव की आशा होती है कि वह सांसारिक, भौतिक सुख एवं एश्वर्य का भरपूर आनंद लें, उनकी तमन्ना होती है कि हमारे पास भी गाड़ी, बंगला व नौकर चाकर हो, लेकिन हर व्यक्ति की कड़ी मेहनत के पश्चात भी वह अपनी महत्वकांक्षाओं को पूर्ण नहीं कर पाता है और अपने भाग्य को कोसता रहता है।
हमारे वैदिक धर्म ग्रंथ कहते हैं कि मनुष्य को जो सुख दुख प्राप्त हो रहे हैं, वह पूर्व जन्म के फल हैं, जो मनुष्य को हर हालत में भोगने ही होंगे। मानव को अपनी महत्वकांक्षा, भौतिक समाज की प्राप्ति के लिए धन की आवश्यकता होता है। धन को व्यय कर अपनी इच्छानुसार संसाधन जुटा सके, किंतु यह सभी मनुष्य के लिए मुमकिन नहीं है। वही व्यक्ति अपनी सुख सुविधा पूर्ण कर पाता है, जिसके भाग्य में धन योग हों।

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भारतीय वैदिक ज्योतिष में भृंगु संहिता के द्वारा मनुष्य की जन्म कुंडली का विवेचन कर जातक की जीवन में कितने प्रतिशत सुख एवं धन होगा या नहीं।

भारतीय ज्योतिष लग्न को आत्मा कहा जाता है। यदि लग्न या लग्नेश का संबंध धनेश, सुखेश, भाग्येश, कर्मेश और लाभेश से होता है तो जातक धनी होता है।

धनेश का संबंध लग्नेश, सुखेश, पंचमेश, भाग्येश, कर्मेश एवं हो तो जातक धनी होता है।

सुखेश का संबंध लग्नेश, धनेश, पंचमेश, भाग्येश, कर्मेश एवं लाभेश से होता हो जातक धनी होता है।

पंचमेश का संबंध लग्नेश, धनेश, सुखेश, भाग्येश, कर्मेश और लाभेश से होता जातक धनी होता है।

भाग्येश का संबंध लग्नेश, धनेश, सुखेश, पंचमेश, कर्मेश से हो तो जातक धनी होता है।

कर्मेश का संबंध लग्नेश, धनेश, सुखेश, पंचमेश, भाग्येश, लाभेश से हो तो जातक धनी होता है।

लाभेश का संबंध लग्नेश, धनेश, सुखेश, पंचमेश, भाग्येश व कर्मेश से हो जातक सुखी होता है।

कैसे होता है धन योग संबंध

जब लग्नेश संबंधित ग्रह के सा​थ हो या संबंधित ग्रह को देखता हो, या संबंधित ग्रह के भाव में हो, या संबंधित ग्रह लग्न भाव में हो एवं एक दूसरे को देखते हों तो यह योग बनते हैं। इसी प्रकार यह सभी भाव से संबंधित ग्रह के योग बनते हैं। जिनकी संख्या लभभग 21 होती है।

यदि यह दूसरे, चौथे, पांचवें, सातवें भाव में बन रहे हैं तो पूर्ण फल मिलता है, और यदि लग्न तीसरे, नौवें और ग्यारवें भाव में बन रहे हैं तो आधा फल मिलता है। अन्य स्थाना दिक्कतों के साथ धन लाभ होता है।

कुंडली में षष्ठेश, व्ययवेश, अष्टमेश का योग धन प्राप्ति वाले ग्रहों से हो तो दरिद्रता योग बनता है। इस प्रकार जन्म पत्रिका में धनेश प्राप्त वाले को जमा (+) करें और दरिद्रता योग वाले माइनस (-) करें। जितने अधिक होंगे, उसी के अनुसार जातक पर धन का प्रभाव होगा।

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महेश के. शिवा www.ganeshavoice.in के मुख्य संपादक हैं। जो सनातन संस्कृति, धर्म, संस्कृति और हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतें हैं। इन्हें ज्योतिष विज्ञान और वेदों से बहुत लगाव है।
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