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क्यों होता है पति पत्नी में विवाद, ये होते है कारण ?

अक्सर पति पत्नी में शयनकक्ष में बेहद गंभीर मुद्रा में वह विवाद होता है जो शयनकक्ष के बाहर आते ही दो परिवारों के बीच विखंडन का कारण बन जाता है I इस विवाद की अवधि कभी-कभी लंबी हो जाती है जिससे वैवाहिक और पारिवारिक जीवन में तनाव और कलह उत्पन्न हो जाती है और जीवन का आनंद लगभग समाप्त हो जाता है I यह स्थिति तब बनती है जब पति और पत्नी के बीच गुणों का मिलान अच्छा ना हो और मंगल ग्रह प्रभाव भी हो ।

विवाह के पूर्व कन्या और वर का गुण मिलान किया जाता है I अधिकतम 36 गुण माने गए हैं जिसमें से कम से कम 18 गुण मिलने पर विवाह मान्य होता है I परंतु गुण मिलान के साथ-साथ दोनों की कुंडलियो में ग्रह और भाव का भी निरीक्षण करना चाहिए I यदि मिलान में दोष हो तो बेडरूम में झगड़े होते हैं I

ज्योतिषाचार्य सागर जी के अनुसार सप्तम भाव को पति पत्नी के लिए देखा जाता है। वैवाहिक जीवन में सुख के लिए सप्तम भाव को और सप्तम भाव के स्वामी को शुभ स्थिति में होना चाहिए I इस भाव और भाव के स्वामी पर कोई पाप प्रभाव नहीं होना चाहिए I सप्तम भाव और सप्तम भाव का स्वामी अगर पीड़ित होगा तो पति पत्नी के बीच विवाद की संभावना बन जाती है।

इसके कुछ उदाहरण निम्न है:

1. सप्तम स्थान पर सूर्य, शनि, राहू, केतु, और मंगल का प्रभाव।
2. गुरू का दोष पूर्ण होकर सप्तमेश या सप्तम पर प्रभाव।
3. सप्तमेश का छठे, आठवें अथवा बारवें भाव में होना।
4. सप्तम भाव पाप कर्तरी में होना होना।
5. सप्तमेश पर पाप ग्रहों का प्रभाव।

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पति पत्नी में से अगर किसी एक में भी मंगल या मांगलिक दोष है तो समस्या ज्यादा उत्पन्न होती है I  प्राय: देखा गया है कि जिस दंपति के मंगल दोष या मांगलिक दोष है और उनका मंगल दोष निवारण अन्य ग्रह से किया गया है उनमें मुख्य ते द्वादश लग्न चतुर्थ मैं स्थित मंगल वाले दंपति में लड़ाई ज्यादा होती है क्योंकि इसका मुख्य कारण सप्तम स्थान को शयन सुख हेतू भी देखा जाता है I मंगल के द्वादश और चतुर्थ में स्थित होने पर मंगल अपनी विशेष दृष्टि से सप्तम भाव को प्रभावित करता है और यही स्तिथि लग्न में बैठे मंगल में भी देखने को मिलती है क्योंकि लग्न में बैठा मंगल जातक को अभिमानी, अड़ियल रवैया अपनाने का गुण देता है इसलिए मांगलिक दोष वाले जातक का विवाह मांगलिक दोष वाले व्यक्ति से ही होना चाहिए।

ज्योतिष में शुक्र को स्त्री सुख प्रदाता माना है I वैवाहिक वैवाहिक सुख के लिए शुक्र का प्रबल और दोष रहित होना आवश्यक होता है I शुक्र की स्थिति अनुसार ही पति पत्नी से सुख मिलने का निर्धारण किया जाता है I अगर शुक्र नीच का हो या छठे भाव में हो या आठवे भाव में हो तो बेड में झगड़ा होने की संभावना बनी जाती है I शुक्र के 12वें भाव में होने पर पत्नी को सुख प्राप्ति में कमी रहती है।

दांपत्य सुख में गोचर ग्रह का अपना महत्व होता है I सभी ग्रह गतिमान है और राशि परिवर्तन करते रहते हैं और प्रत्येक राशि को अपना प्रभाव देकर सुखी अथवा दुखी होने का कारण बनते हैं I सर्वाधिक गतिमान चंद्र सवा दो दिन में राशि परिवर्तन करता है और चंद्रमा अनुसार मन का कारण होने के कारण और जलीय ग्रह होने से प्रेम का कारक भी होता है और  प्रत्येक राशि में अन्य ग्रहों के भांति  सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रधान प्रभाव जल्दी प्रदान करता है I चंद्रमा अगर छठे, आठवे या बारहवे भाव में हो तो यह स्थिति प्रेम को कम करती है और शयन सुख में बाधा देती है I प्रत्येक ग्रह का प्रभाव दांपत्य जीवन पर अगर सकारात्मक हो तो आनंद भर देता है वही नकारात्मक प्रभाव रति सुख नष्ट कर देता है।

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महेश के. शिवा www.ganeshavoice.in के मुख्य संपादक हैं। जो सनातन संस्कृति, धर्म, संस्कृति और हिन्दी के अनेक विषयों पर लिखतें हैं। इन्हें ज्योतिष विज्ञान और वेदों से बहुत लगाव है।
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